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आरोप है कि स्वास्थ्य सेवाओं के अलावा चुनाव, खेल, मेलों और परीक्षाओं जैसे सरकारी आयोजनों में भी उनसे बेगार कराई जाती है
कोलकाता। अपनी मांगों को लेकर स्वास्थ्य भवन के सामने डटी हजारों आशा कर्मियों के आंदोलन ने अब राजनीतिक रंग ले लिया है। राज्य की स्वास्थ्य राज्य मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य के एक विवादित बयान ने इस आग में घी डालने का काम किया है। मंत्री ने आंदोलनकारी महिलाओं पर राजनीतिक स्वार्थ के लिए चंदा देने का गंभीर आरोप लगाया है, जिसके बाद विपक्षी दलों और श्रमिक संगठनों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। स्वास्थ्य भवन के बाहर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठी आशा कर्मियों को संबोधित करते हुए मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य ने सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि इन महिलाओं को ढाल बनाकर विपक्षी दल अपनी राजनीति चमका रहे हैं।
उन्होंने कहा कि मैंने सुना है कि आप लोग राजनीतिक स्वार्थ के लिए चंदा भी देते हैं। हालांकि इसकी पुष्टि मैं नहीं करती, लेकिन चर्चा यही है। चंदा देना अपराध नहीं है, पर आपके नाम पर जो गंदी राजनीति हो रही है, उसे समझना होगा। राज्य सरकार ने आशा कर्मियों के लिए बहुत कुछ किया है, फिर भी विरोध केवल बंगाल सरकार का क्यों? केंद्र के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठती? मंत्री के बयान पर पलटवार करते हुए भाजपा नेता सजल घोष ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि सरकार ने स्वास्थ्य भवन के सामने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए जो लोहे की बैरिकेडिंग खड़ी की है, वह सरकार के डर का प्रतीक है।
घोष ने चेतावनी दी कि जनता इस अहंकार को बर्दाश्त नहीं करेगी और जल्द ही उन्हें सत्ता की इस दीवार के पीछे से बाहर खींच लाएगी। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे एआईयूटीयूसी के राज्य सचिव अशोक दास ने आंकड़ों के जरिए सरकार को घेरा। उन्होंने आशा कर्मियों की दयनीय स्थिति का खाका खींचते हुए बताया कि आशा कर्मियों को प्रतिमाह मात्र 5250 रूपये दिए जाते हैं, जबकि उनकी मांग इसे बढ़ाकर न्यूनतम 15,000 रूपये करने की है। गर्भवती महिलाओं की देखभाल से लेकर टीकाकरण तक, उन्हें रात के 2 बजे भी अस्पताल जाना पड़ता है। आरोप है कि स्वास्थ्य सेवाओं के अलावा चुनाव, खेल, मेलों और परीक्षाओं जैसे सरकारी आयोजनों में भी उनसे बेगार कराई जाती है।